जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन

भोजन के सन्दर्भ में एक बात ध्यान देने की है कि भोजन यदि अच्छी मनःस्थिति से बनाया जाता है तो वह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है अन्यथा वह केवल पेट भराऊ हो जाता है। जिस दिन गृहणी के मन में कोई क्लेश हो वह भोजन स्वादिष्ट नहीं होता है। बाजारों में बनाया गया भोजन केवल धन अर्जन के उद्देश्य से बनाया जाता है। इसलिए यह पौष्टिक नहीं होता है। माता के हाथ का बनाया गया भोजन सबसे अधिक स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है क्योंकि माता पूर्ण स्वस्थ मनोयोग के साथ अपने परिवार बच्चों के लिए बनाती हैं।


भोजन जीवधारियों के शरीर की प्रथम आवश्यकता है चूँकि मानव अपने भोजन में चयन कर उसकी पूर्णता की क्षमता से परिपूर्ण हैं। अलग-अलग संस्कृतिओं और क्षेत्रों में भोजन चयन कर भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। श्रीमद्भगवतगीता में भोजन के चार प्रकार बताये गये हैं-1. पेय, 2. चर्वण, 3. लेहा, 4. चोष्य आदि। इसी ग्रन्थ में भोजन को गुणों के आधार पर, तीन प्रकार का बनाया गया है- 1. सत गुणी 2. रजो गुण, 3. तमोगुणी,-(17/8-20)


भारत में ऋतुएँ भोजन पर अपना प्रभाव डालती हैं। ग्रीष्मकाल में हल्का सुपाच्य, पेय भोजन ज्यादा पसन्द किया जाता है। वहीं वर्षा ऋतु में सब्जियों का प्रयोग कम किया जाता है। क्योंकि इन दिनों पत्तेदार सब्जियों आदि में कीट प्रकोप रहता है तथा मक्खी मच्छरों की संख्या अधिक होती है इसलिए शाम का भोजन दिन छिपने के पूर्व आचार या दूध-दही के साथ लिया जाना उचित रहता है। शीत ऋतु में चटपटे व्यंजनों का सेवन अधिक होता है।



भोजन के सन्दर्भ में एक बात ध्यान देने की है कि भोजन यदि अच्छी मनःस्थिति से बनाया जाता है तो वह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है अन्यथा वह केवल पेट भराऊ हो जाता है। जिस दिन गृहणी के मन में कोई क्लेश हो वह भोजन स्वादिष्ट नहीं होता है।


बाजारों में बनाया गया भोजन केवल धन अर्जन के उद्देश्य से बनाया जाता है। इसलिए यह पौष्टिक नहीं होता है। माता के हाथ का बनाया गया भोजन सबसे अधिक स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है क्योंकि माता पूर्ण स्वस्थ मनोयोग के साथ अपने परिवार बच्चों के लिए बनाती हैं।


भोजन करते समय उकडू नहीं बैठना चाहिए तथा लम्बे पाँव करके भी नहीं बैठना चाहिए तथा दक्षिणामुख बैठकर भी भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन के पूर्व भगवान का भोग लगाकर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए। भोजन खाते समय चप-चप नहीं करना चाहिए। मध्याह्न का भोजन 11 से 1.00 बजे के मध्य होता है इस में अधिकतर घरों दाल, रोटी, धनिया या पोटीना की चटनी हरी मिर्च, मूली, आदि का प्रयोग होता है चावल भी कभी-कभी बनाया जाता है। खिचड़ी का प्रयोग अल्पमात्रा में होता है दलिया और खिचड़ी को मरीजो का भोजन माना जाता है।


तीसरे प्रहर में शीत ऋतु को छोड़कर 'ठंडाई' का प्रयोग किया जाता है, यह स्वयं शिलबट्टे पीस कर तैयार की जाती है इसका चलन अब बहुत कम हो गया है चाय का चलन बड़ गया है।


एक समय था जब सूकाक्षेत्र बूंदी के लड्डू की दावत बहुत महत्वपूर्ण होती थी तब दावत में केवल भरपेट लड्डू ही खिलाये जाते थे और खाने वाले भी ऐसे थे कि एक पल्ला लड्डू खा लेते थे। सौ पचास लड्डू खाने वाले तो अभी हैं। महिलाओं में भी ऐसी थी जो पचास साठ लड्डू खालेती थी। आठ लड्डू से कम तो एक बार में परोसे ही नहीं जाते थे। दावत में अगर किसी ने खाने वाले ने लड्डू सिर्फ परोसने बात कह जो बराबर में बैठा व्यक्ति चिड़ जाता था कि आप कहीं दूसरी जगह बैठ जायें वरना मैं भूखा रह जाऊँगा।


भोजन के समय आसन और मौन का अपना अलग ही महत्व है भोजन भूमि पर रेशमी, कम्बल, ऊनी, काष्ठ तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन पर पालथी मार कर बैठकर ही करना चाहिए। काष्ठ आसनों में शमी, (शीशम) काश्मीरी शल्ल (शाल) कदम्भ, जामुन, आम, मौनक्षिरी एवं वरूण के आसन श्रेष्ठ रहते हैं। लकड़ी के आसनों में लोहे की कील नहीं होनी चाहिए।


भोजन के समय माँगने या मना करने का संकेत हाथ से ही करना चाहिए। भोजन कैसा है यह भी पूछना ठीक नहीं उसकी प्रशंसा पर निन्दा भी नहीं करनी चाहिए, सूकरक्षेत्र में भोजौ की प्रशंसा निन्दा प्रमुख विषय होता है।


भारत में जब हम कहीं भोजन करने बैठते हैं तो पहले जल हमारे समाने रखाजाता कहा जाता है? फिर कहा जाता है भोजन करो। फिर जल पहले क्यों? 'छान्दोग्य उपनिषद' के सप्तम आध्याय के दशम खण्ड में अन्न की अपेक्षा जल का महत्व अधिक है, यह बताया गया है अन्न जल से ही उत्पन्न होता है 'क्षुधा' से 'तृषा' ज्यादा तीक्षण होती है। भूख भोजन से शान्त होती है पर जल न हो तो भूख भी भाग जाती है। अन्न का कारण जल है, यदि जल न हो तो अन्न नहीं होगा, इसलिए अन्न से पहले जल हमारे समाने परोसा जाता है। आज के आधुनिक भोजनालय में पहले खाली बर्तन हमारे सामने आते हैं।


यन्दवेद उपनिषद के छठे आध्याय के छठे खण्ड के तीसरे भाग में बताया गया है कि पिये हुए जल का जो सूक्षम भाग होता है वह एकत्र होकर प्राण को पुष्ट करता है।


एक कहावत है- 'जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन' छन्दोग्य उपनिषद के छठे अध्याय के पाँचवे और छठे खण्ड में इस स्पष्ट किया गया है, भोजन में लिया गया अन्न जठुरग्नि द्वारा तीन रूपों में परिवर्तित होता है- 'अन्नमशितं हे त्रेध विधीपते' स्थूल भाग मल हो जाता है, माध्यम भाग मांस होता है और उत्पन्न सूक्ष्म भाग मल हो जाता है, इसीलिए भारतीय ऋषियों ने भोजन की शुद्धता और सर्वग्रहिता पर बहुत गंभीरता से विचार किया सभी का अन्न ग्राहच नहीं है क्योंकि वह मन के निर्माझा का एक कारक है मन बुद्धि और कर्मो को प्रभावित करता है। इसलिए भोजन अन्न ग्रहिचता विचारणीय है।


भारत में भोजन स्वाद, रूचि पौष्टिकता सात्विकता सुपाच्यता आदि में विश्व के अन्य देशों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ है, यहाँ के व्यंजनों और मिष्ठानों की कोई तुलना नहीं है। आज एक चलन नवधनाढ्यों बहुत अधिक है, यदि लोग घर के भोजन को त्याग बाहर भोजनालयों में भोजन करना पसन्द करते हैं। वहाँ भी वह भोजन जो अपने देश का नहीं कर विदेशी होता है, नवधनाढ्य वहाँ अपने बच्चों को भारतीय भोजन के स्थान पर विदेशी भोजनों के प्रति आकर्षण पैदा करते हैं, जिनके माता-पिता ऐसा करते हैं, वे सन्तान भारत के प्रति कैसे समर्पित हो सकते है।


गीता 1/8-10 के अनुसार सरल, सारवात और हितग्राही आहार सात्विक हैं इससे आयु, बल, उत्साह आरोग्य सुख और प्रीति की वृद्धि होती है। अधिक कटु, अम्ल, लवण, उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष और रोग उत्पन्न होते हैं बासी रसहीन दुन्धियुक्त जूठा और स्पर्ण और दृष्टि से अपवित्र (उच्छि जुट) आहार तामसिक होते हैं जिनसे तन-मन में जड़ता अज्ञानता और पशुमान जाग्रत होते है।


भोजनान्न पवित्र शुद्ध होना चाहिए की और अन्य भोजन तत्व न हो। गृहणी या रसोइया का अन्तकरण और वाह्य दोनों रूस से शुद्ध हो। आहारशुद्धि से सत्वशुद्धि, सत्वशुद्धि से ध्रुवा स्मृति और स्कृतिशुद्धि से समस्त ग्रथियों का भोजन होता है


आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्तवशुद्धों ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्मे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।


मनुस्कृति में कहा- अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोद्धा देवो महेश्वरः-अन्न ब्रह्म है रत विष्णु है और आहार ग्रहण करने वाला महेश्वर है। वर्त्य लोगों का अन्न ही अकाल मृत्यु का कारण होता है।


भोजन के पात्र भी व्यक्ति के तन मन को प्रभावित करते हैं स्वर्ण जल पात्रों में अतिरिक्त कांसे या पीतल के पात्र श्रेष्ठ हैं या फिर पलाश, कमल (पुखे) केले आदि के पत्र प्रयोग किये जा सकते है। मिट्टी के पात्र जल पात्र के रूप में प्रयोग किये जाय। आजकल प्लास्टिक चीन मिट्टी काँच या अन्य धातुओं के पात्र प्रयोग में लाये जा रहे हैं उनके परिणाम हमारे सामने है।


भोजन को बनाने और गृहण करने के सन्दर्भ में गीता में 3/13 कहा गया है यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग आपने शरीर पोषण के लिये ही अन्न पकाते हैं वे तो पाप को ही खाते हैं।


आज के लिखे पढ़े लोग वायु के द्वारा संक्रमित रोगों से बचाव के लिए अत्यधिक सजग हैं। तरह-तरह के मास्क पहनते हैं पर भोजन को अपवित्र और दूषित करने के प्रति सजग नहीं हैं। कही भी में एक ही प्लेट में भोजन करना यह एक जूठे हाथों से भोजन परोस लेना बुरा नहीं मानते। कब हम जूठन और पात्रों की पवित्रता के प्रति सजग होंगें?


भोजन का मन के साथ सम्बन्ध बहुत गहरा है। महाभारत शन्ति पर्व 217/98 में कहा गया है-आहार नियम में नास्य पाप्मा शाम्यति राजसः अर्थात् आहार में संयम रखने से पाप का श्रय होता है कुछ लोग बाजारों में चाट आदि के चाटने में बड़ा ही गर्व अनुभव करते हैं। वे स्थान का निरीक्षण नहीं करते है नीचे गन्दी जाली बड़ रही है। भोजन को ग्रहण करने में भोजन का निर्माणक कौन है स्थान कहाँ है व समय क्या अवश्य ही अवलोकन करना चाहिए तथा भूख लगने पर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए महाभारत उद्योगपर्व 34/50 कहता है-सुत् स्वादतां जपति। कुछ लोगों की आदत यह होती है कि वे हर वक्त कुछ न कुछ खाते रहते हैं-भुख अजा सम चलाता ही रहता है महाभारत शान्तिपर्व 693/10 कहता है-भोजन दिन में एक बार तथा रात्रि को एक बार करना चाहिए। गृहस्थ को दो बार भोजन करना चाहिए।



 


भोजन बनाना एक कला है तथा उसे गृहण करना एक विज्ञान है। भोजन में तुलसी पत्र को सम्मिलित करने में अन्न की न्यूनतम विषाक्तता समाप्त हो जाती है-तुलसीदल सम्पर्कादन्नं भवति निर्विषम्।


भोजन करने के पूर्व पैर, हाथ, दाँत और मुँह को धोकर बैठना चाहिए। यदि घर पर किसी को भोजन करने हेतु निमन्त्रित किया गया है या कोई अथिति घर पर है तो उन्हें भोजन करने के बाद ही गृहास्वामी व गृहणी को भोजन करना चाहिए।


गृहस्वामी के लिए तो यह भी कहा गया है कि पहले घर पर आई हुई विवाहित पुत्री या गर्भिणी, बृद्धों का या परिवार को सदस्य रूठ गया हो तथा बालकों का सब को भोजन करने बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। इनकी की अपेक्षा कर भोजन गृहण करना पाप करना है।


त्रिकाल सन्ध्योपसना तथा मध्यान्न और सायंकाल में दो बार भोजन किया जाना आवश्यक है।


भोजन पात्रों का भोजन के पूर्व जल से परिवृत्त करना चाहिए-


भोजना दौ सदा विप्रैर्विधेय परिषेचनम्। तेन कीटादयः सर्वे दूरं यान्ति न संशयः।।


भोजन का थाल सम्मुखन के बाद तीन ग्रास जो नमक डाले हुए पदार्थो के न हो थाली से निकाल कर भूमि पर थाली के दाहिनी ओर रखना चाहिए तथा ये मन्त्र उच्चरित किया जाये-


ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवनपतये स्वाहा, ॐ भूतानां पतये स्वाहा तथा जलपात्र से जल लेकर इन्हीं मन्त्रों से जल भी छोड़ना चाहिए। उसके उपरान्त भोजन थाल में जो भी मिष्ठान हो उसके पाँच छोटे-छोटे ग्रास इन मन्त्रों के साथ लेने चाहिए- ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा। ये उदर में निवास करने वाली अग्नि में परमसत्ता के प्रति आहुतियाँ हैं। यह भी आवश्यक है कि भोजन के पूर्व ॐ अमृतोपस्तरणमक्षि स्वाहा।


भोजन चूल्हा, अंगीठी, मट्टी या जगरा पर बनाया जाना चाहिए। बने हुए भोजन में ऊपर से नमक मसाले आदि मिलाकर नहीं खाना चाहिए।


भोजन सुखासन से बैठकर करना चाहिए। एक ही थाली में कई लोग एक साथ भोजन न करे एक थाली में एक व्यक्ति को भोजन करना चाहिए। भोजन के समय उत्तेजित न हो उच्च स्वर से न बोले न हँसे, न शोक व रूदन करें निषिद्ध अन्न का भोजन का भोजन न करें। ध्यान देने की बात है डोंग सिस्टम (खडेसुरी भोज) में भीड की धक्का मुक्की में अन्य लोगों का स्पर्श होता है भोजन के समय किसी स्पर्श बर्व्य  है


चीनी आदि पेय भी किसी के झूठे पात्रों में नहीं लेना चाहिए। आज के भोजों में क्रॉकरी कैसे साफ होती है सबको दिखते हए भी नहीं दिखती बड़े से बर्तन बर्तनों का ड्रबाकर निकाल दिया जाता है।


स्मृतिकारों ने जिस भोजन को त्याज्य बताया है वह है रजस्वला स्त्री का स्पर्श किया हुआ, चिड़ियों-पक्षियों का खाया हुआ कुत्ते-बिल्ली का स्पर्श किया पर खाया हुआ, गाय का ध्राण किया हुआ, लार, थूक, स्वदे, बाल पड़ा हुआ, तिरस्कार अपमान के साथ दिया हुआ। वेश्या, कलाल, कुरूधन, कसाई, और राजा का अन्न नहीं खाना चाहिए।


रोटी, दाल, दलिया, चावल आदि का भोजन कच्चा भोजन कहा जाता है यह सभी का ग्राह्य नहीं होता है इसे 'सकरा' भोजन भी कहा जाता है पक्का भोजन पकवाने पक्का भोजन भी विचार के साथ ही गृहण करने का आदेश है रोटी और बेटी का सम्बन्ध सजातीय पहले है, स्वर्ण भी बाद में है। एक कहावत है बारह ब्राह्मण तेरह चौके यानि भोजन बनाने लिए अग्नि भी किसी ग्राह्य नहीं होती ब्राह्मण भी अनेक प्रकार के हैं, वे भी एक दूसरे का कच्चा भोजन (सकरा) नहीं ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार व्यवस्था क्षत्रियों और वैश्यों में भी थी। एक नैतिक आचरण था कि किसी के चौके में दूसरा व्यक्ति प्रवेश नहीं करता था। इसे मालवी भाषा में 'चौका अवडाना' बोलते हैं। ब्राह्मण के द्वारा भोजन बनाने पूर्व जितने स्थान से लीप-पोत कर या जल छिड़कर शुद्ध किया जाता है उतने स्थान पर कोई अन्य प्रवेश नहीं कर सकता, ब्राह्मण के चौके के बारे कहा जाता है 'ब्राह्मण का चौका बाबन बीघा में'। भोजन के विषय कुछ सूत्र अत्यधिक विचारणीय है।


भोजन के विषय कुछ सूत्र अत्यधिक विचारणीय है।


प्रथम- स्थान प्रत्येक क्षेत्र का प्रभाव हमारे तन मन पर होता है। वैसे भोजन बनाते खाते समय ऐसे स्थान पर चयन हो जो चारों और से घिरा हुआ हो। खुले में भोजन बनाते समय पंक्षियो मधुमक्खियों का ध्यान रखना चाहिए घूम से वे प्रभावति हैं। आम के पेड़ पर जब बौर आ रहा हो तो डाल के नीचे भोजन नहीं बनाना चाहिए। किसी भी फलते-फूलते वृक्ष के समीप भी भोजन नहीं बनाना चाहिए। मन्दिर व गौशाल का स्थान भोजन बनाने के लिए उपयुक्त होता है। श्मशान भूमि या किसी अपवित्र व गन्दे स्थान पर भी भोजन नहीं बनाना व करना चाहिए। पवित्र नदियों सरोवरों व तीर्थों में भोजन बनाना व ग्रहण करना श्रेष्ठ है। मक्खी, मच्छर बैक्टीरिया कीटाणुओं से दुषित स्थान भोजन के लिए वर्ण्य है, धूल, धूप का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोजन बनाने वाले के लिए चौके के अधिकृत व्यक्ति ही प्रवेश का अधिकारी होता है। अनधिकृत का छूना भी वर्ण्य होता है।



द्वितीय- जिस धन से भोजन बनाया जा रहा है वह धर्मनीति और अनाचार से सृजित धन से बनाया गया है तो वह भोजन शान्तचित मन में भी विकृति पैदा कर देता है।


तृतीय- भोजन ग्रहण करने का समय निश्चित होना चाहिए। क्योंकि शरीरिक अवयवों की क्रियाशीलता हर समय रहती है मध्य रात्रि के समय पाचन तन्त्र सर्वाधिक सक्रिय होता है। सुबह को चाय आदि पेय से चलना नहीं चाहिए। दोपहर को व शाम सूर्यास्त के बाद भोजन गृहण सोने तीन घण्टे पहले कर लेना चाहिए। चकर संहिता में कहा गया है-


हिताशी स्यान्मिताशी स्यात् कालभोजी जितेन्द्रिय।


चतुर्थ- भोजन बनाने और गृहण करने वाले का मन भी पवित्र होभोजन परोसने में भेदभाव नहीं करना चाहिए। पात्रों व भोजन सामग्री को चूहे, कीटो, मक्खी, मच्छरों आदि से बचाकर रखना चाहिए। भोजन अशुद्धता से अनेक घटनाएँ हो जाती है। सामूहिक भोजन में पंगत में एक साथ ही भोजन करके उठना चाहिए।


भारतीय संस्कृति में भोजन अन्नदान का भी विशेष महत्व वर्णित है। ऋग्वेद 10/117/3 में कहा गया है-


स इद्धोजो भवति ददात्यन्नकामाय चरते कशाय। अरभस्मै भवति यामहूता उतापरीषु कृणुते सखायम्।।


अन्न की कामना करने वाले निर्धन याचक को जो अन्न देता है, वही वास्तव में भोजन करता है। ऐसे व्यक्ति के पास पर्याप्त अन्न रहता है और समय पड़ने पर बुलाने उसकी सहायता के लिए तत्पर अनेक मित्र उपस्थित हो जाते हैं।


कठोपनिषद् 1/1/8 में कहा गया है-


काशा प्रतीक्षे संगत सूनृतां च इढटापूर्ते पुत्रपशुश्चे सर्वान्। एतद् वृउक्त पुरुषस्याल्पयेघसो। यस्यानश्रन् वसति ब्राह्मणो गृहे।।


जिसके गृह में ब्राह्मण और अतिथि अभ्यागत भोजन किये बिना रहता है उस मानव के अनेक प्रकार आशा कमाना प्रतीक्षा उनके द्वारा पूर्व होने वाले सभी प्रकार के सुख, मृदुवाणी का फल, यज्ञ, दान, कुच तडाग वारिश आदि का निर्माण का प्रतिसूफल पुत्र व पशु इन सभी वह खो देता है।


भोजन बनाने वाले के वस्त्रों के सन्दर्भ में भी कहा गया है कि पुरुष पूजा और भोजन के समय धोती कच्छ (लांग) लगाकर ही बनाना चाहिए, लुंगी की तरह न बाँधकर जैसे कुछ लोग भजन करने वस्त्र व आसन अलग रखते हैं, वैसे ही भोजन का आसन व वस्त्र अलग रखने चाहिए। 'मुक्त कच्छो महाधमः।


अकच्छस्थ द्विकच्छस्य आशिखो। शिखवर्जितः। पाककर्ता हत्यग्राही षडैते ब्राह्मणाधमाः (स्मृतिवचन)


आपस्तम्ब ऋषि ने अपनी स्मृति 6/3 में नीले रंग के परिधानों का भी निषेध कई कार्यो के लिये किया है- उसमें भोजन का महायज्ञ भी शामिल किया है-


स्नानं दानं जपो होमः स्वाधामः पितृतर्पणम। पञ्चमज्ञा वृथा तस्य नीलीवस्त्रस्य धारणत्।।


भोजन के बाद यदि भोजन कण दोनों में फंसे हों तो उन्हें निकालने के लिये पानी या नीम की सींक का प्रयोग ही करना चाहिए, सोलह बार कुल्ला करना चाहिए। मुँह में पानी रखकर आँखे धोनी चाहिए तथा लघु शंका भी तुरन्त ही करनी चाहिए।


भोजनोपरान्त, दौड़ना, व्यायाम, योग, तैराकी स्नान, अश्वारोहण, मैथुन और तत्काल ही बैठकर काम नहीं करना चाहिए। अपितु सौ दो सौ कदम चलना भी चाहिए, फिर वज्रासन से बैठना चाहिए। फिर सीधे लेटकर आठ श्वास लेनी चाहिए, दाहिनी करवट से 16 बार श्वास भरना चाहिए, 32 बार बाँयी करवट से लेट कर श्वास लेना लाभ प्रद होता है। पाचन तन्त्र ठीक रहता है।


आयुर्वेद में तीन प्रकार के भोजनों का उल्लेख हैं- 1. शमन करने वाला भोजन 2. कुपित करने वाला भोजन 3. सन्तुलन रखने वाला भोजन।


भोजन के बाद सौफ, ताम्बूल, इलायची या गुड़ चबाने व खाने से पाचन क्रिया ठीक रहती है।


मनुस्मृति-2/55 में कहा गया है-


पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जञ्च मच्छति।


अपूजितं तु तद मुक्तमुभयं नाशयेदिदम्।।


प्राप्त भोजन को भगवान को अर्पण करें, उसकी निन्दा न करें, अन्न का आदर करें, अनादरित अन्न से सामर्थ्य और वीर्य दोनों नष्ट हो जाते हैं।


सती मदालसा ने भोजन के सन्दर्भ में कहा है- पूर्व या उत्तर की और मुँह करके भोजन के लिए आसन पर बैठे, जूठे मुँह वार्तालाप न करें, न ही स्वाध्याय करें। जूठे हाथ से गौ, ब्राह्मण, अग्नि, अपने मस्तक को न छुएँ, न ही सूर्य, चन्द्रमा, तारों की और देखे।


भोजन के सन्दर्भ में समर्थ गुरु रामदास जी के दासबोध 11/3/21 तथा 12/10/1 में कहा है-


चंकाग्र असावें मन। तरी मग जेबितां भोजन। गोड वाटे।


भरपेट भोजन के बाद बाकी अन्न को बाँट देना चाहिए, व्यर्थ नहीं फेकना चाहिए।


आपण येथेष्ट जेवणे। उरले ते अन्न वाटणे।। परंतु कया दवडणे। हा धर्म नव्हे।


ऋग्वेद 10/117/1-2 में कहा गया है-


है। सृष्टि कर्ता ने प्राणियों को क्षुधा देकर लगभग मार ही डाला है जो अन्न दानकर जठराग्नि को शान्त करता है वही दाता है। जो जरूरतमंद को भोजन न देकर स्वयं भोजन करता है, एक दिन वह भी मरता है, देने वाले को कभी घाटा नहीं होता, उसे ईश्वर देता है।


भोजन या अन्न की इच्छा के साथ कोई द्वार पर आवे और उसकी यह इच्छा पूरी न की जाय और स्वयं भोजन किया जावे तब उसे कठोर मन को कभी सुख नहीं प्राप्त होता है।



न वा उ देवाः क्षुधमिद्वधं ददुरूताशितमुप गच्छन्ति मृत्युवः। उतो रपिः पृणतो नाप दस्यत्युतापृणन् मर्दितारं न विन्दते।। य आध्राय चकमानाय पित्वो डन्नवान्त्सन रकितायोपजुग्मुषे स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित् स मर्डितारं न निन्दते


भोजन की याचन पूर्ति के लिये तो यह भी कहा गया है-


ग्रासाद्र्धमपि ग्रासमर्थिम्यः किं नदीयते।


आजकल अन्न भण्डारण काला बाजारियों द्वारा किया जाता है श्रीमदभागवत 7/14/8 में कहा गया है-


मानद भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्व हि देद्विनाम्। अधिकं योडमिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।।


जितने अपने उदर पूर्ति हो उतने ही अन्न पर अपना अधिकार है


भूखे व्यक्ति को अन्न भोजन खिलाने तथा प्यासे को दानी पिलाने में विलम्ब व विचार नहीं करना चाहिए-


न हि कालं प्रतीक्षत जतं दातुं तृषान्यिते। अन्नोदकं सदा देयनित्याह भगवान अनुः।।विष्णु धर्मोत्तर पुराण 112/10


भूखे को भोजन देने के लिये महाभारत अनुशासन पर्व कहा गया है-


सर्वेषामेव दानानामन्नं श्रेष्ठ मुदाहृतम् तं हि प्राणस्य दातारस्तेम्यो धर्मः सनातनः।


ब्रह्मपुराण 218/26-27 में भोजन देने वाले कह गया-


 अन्नस्य प्रदानेन नरो याति परां गतिम


वराहपुराण में भोजन अन्न देने वाले कही गई है। महर्षि संवर्तजी ने कहा है- सर्वेलाभेव दानानामन्नदानं पर स्मृतम्।


अतिथि देवो भवः के भाव परिपूर्ण हमारी संस्कृति में ब्रह्मणों, अतिथियों या याचकों की स्वागत व भोजन में क्या पदार्थ हो किस महीने में कौन सा भोज्य होना चाहिये यह भी स्पष्ट है।


 चैत्र मास में गोधूम, अरहर, दही-चावल, बेल फल, आम आदि से तृप्त किया जाये-भविष्यपुराण। बैसाख मास में जौ के सत्तू, तक्र, विविध प्रकार के पेय अवश्य ही भोजन में होने चाहिए। जेष्ठमास के दही व भात का आहार हो आसाढ मास में आँवला का मुरब्बा या अचार, श्रावण खीर, भाद्रपद में खीर पुआ, अश्विन में पितृपक्ष व शारदीय नवरात्रि होती है जो श्राद्ध के निमित्त भोजनबना हो उस में तप्त किया जाय, नवरात्रि में हलुआ, खीर, चना का आहार हो कार्तिक मास में अनेक त्यौहारों के मिष्ठान से भोजन हो, अग्रहण्य में गुड का सेवन किया जाये, पौष माघ मास से मेवो, गुड़, बाजरा का मलीदा, मूंगफली, तिल, खिचड़ी आदि का भोजन होना अनिवार्य है। फाल्गुनमास में गुजिया, नमकीन, आदि का आहार होना चाहिए।


भोजन में वैविध्य होना अनिवार्य है, इसीसे आवश्यक पोष्टिक तत्व शरीर को प्राप्त होते हैं। महाभारत में पितामह भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद का सार है कि कृर्तिक नक्षत्र स्पृतयुक्त, रोहिणी नक्षत्र-फल घी, दूध और पेय, आर्द्रा-तिल मिश्रित खिचड़ी, पुनर्वसु नक्षत्र में पुआ, मधा में तिल, पूर्वा फाल्गुन मक्खन मिश्रित भोजन, उत्तरा फाल्गुन में घी, दूध साठी के चावल, ज्येष्ठ नक्षत्र में शाक और मूली, उत्तरा षाढ़ा नक्षत्र में सत्तू, अभिजित नक्षत्र मधु, घृत, दुग्ध, पूर्वा भाद्रपदा नक्षत्र में उड़द, सफेद मटर का आहार विशिष्ट लाभप्रद होता है।


भोजन- अन्न और जल का मिश्रित नाम है। पृथ्वी पर तीन रत्न हैं, अन्न, जल और सुभाषित। भोजन बनाना कला है और पचाना विज्ञान है। भोज्य-उत्पादन, संवर्धन, संरक्षण, सुव्यस्थित वितरण, गृह और राष्ट्र के लिए आवश्यक वैदिक वाङमय में इस विषय पर विस्तार से विमर्श किया गया है। प्रश्नोपनिषद 2/15 में कहा गया है- अन्नं वै प्रजापतिः तैत्तिरीयोपनिषद 2/2/1 में कहा अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। यः काश्च पृथिवी श्रिताः अथो अन्नेनैव जीवन्ति। --- अन्नं हि भूतानां जेष्ठम् तदमात्सर्नोषध्मुच्यते अन्नं ब्रह्मति व्यजानात्।अन्नाद्धचेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तैत्तिरीयोजनिषद 3/2/1


अन्नं न परिचक्षीत। यद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम् तैत्तिरीपोपनिषद 3/8/1, 3/9/1


भोजनान्न वितरण के विषय में ऋग्वेद धनान्नदान सूक्त 10/117/6 में कहा गया है-


भोधमन्नं विन्दते अप्रचेता सत्यंतनीमि वध इत स तस्य केललाधो भवति केवलादि


शिवपुराण उ. सं 12/1, 12/17-18, 24, 29, 30, कूर्म पुराण उ.वि. 26/17, 44, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण 211/44-46 वराहपुराण अध्याय-206 वामनपुराण 94/22, 36 मत्स्यपुराण 83/42-43, पद्मपुराण उत्तरखण्ड, भविष्यपुराण अध्याय-169, स्कन्दपुराण का पू. 38/37, गरुडपुराण 2/4/7-8, नारदपुराण आदि अन्न तृप्ति का विवरण दिया गया है।


भारतीय घरों में भोजन का स्वरूप इतना बदल गया कि सुबह का कलेऊ छाछ, हलुआ, परांवठे, मोठ रमास चना और अंकुरित अनाज दाल कहीं भी चौके में खोजने पर ही मिलेंगे, चाय, ब्रैड, टोस्ट, मेगी, पास्ता, बिस्कुट, नमकीन आदि का कलेऊ अब होता है। मालावांचल से 'खाटी छा' मट्ठा और मक्की की रावड़ी कितने लोग खा पा रहे हैं, चूला, लकड़ी, बडीता, कंडा तो संग्रहायलों में देखे जाने की स्थिति प्राप्त कर चुके हैं, मोटे आनाज-जौ, ज्वार, मक्का, बाजरा, आदि कितने चौके में दिखेंगे। वेजर-(जौ, गेहू, चना, मटर) का आटा कितने लोगों के भाग्य में बचा है। मिस्सी रोटी के नाम पर क्या खाते हैं पता नहीं। पर अब पनफसी रोटी महानगरीय ही छोटे नगरों की भी बहनें नहीं बना पायेंगी। 'बैड टी' के साथ आज के कान्हा और राधिका उठते हैं। 'कुककुट फल' अण्डा के साथ ब्रेकफास्ट होता है, क्योंकि रोज खाओ अण्डे का विज्ञापन देखा है। शिक्षा पाठयक्रम में जीव हिंसा और मांसाहार का विरोध पढ़ा ही नहीं है, आज के डॉक्टर के कहने पर शाकाहार का विचार होता है क्योंकि हृदय और रक्तचाप आदि रोग हो जाते हैं। कभी भारतीय सनातन ग्रन्थों- वृहदपरासर स्मृति, श्रीमद्भागवत 7/15/7, मनुस्मृति 4/46-47 हेमाद्रि, कालामा., मदनरत्न, पृथ्वीचं., स्मृतिरत्नावली, दिवोरा., प्रका., दीपिका विवर., श्राद्धकल्प लता आदि-अवलोकिक किया होता तो अभच्क्ष्य भक्षण से बचा जाता। पर यह पोंगापंथी हो जाती।